हमारा देश भारत इस समय सपनों के स्वर्ग का सुख भोग रहा है, जबकि हकीकतें उसे दंश दे रही हैं। सरकार ने मीडिया के जरिये यह सपना परोसकर लोगों को खुश करने की एक नयी कोशिश की है कि हमारे देश में भी अब जापान की तर्ज पर बुलेट ट्रेनों का रोमांच नए दौर में पहुंच रहा है। क्योंकि मुंबई-अहमदाबाद की तर्ज पर देश के अन्य 12 रूटों पर बुलेट ट्रेन चलाने के लिए सर्वे किया जा रहा है। सवाल यह है कि क्या केवल सर्वे को सपना पूरा होने का रोमांच माना जा सकता है? रेल राज्य मंत्री मनोज सिन्हा के अनुसार नेशनल हाई स्पीड रेल कॉरपोरेशन नईदिल्ली से गाजियाबाद वाया हापुड़, वाराणसी तक बुलेट ट्रेन की संभावनाओं को तलाश रहा है। अगर ऐसा हो सका तो 720 किमी की दूरी महज महज तीन घंटे में पूरी होगी।
इस खबर को किसी चण्डूखाने की गप्प कैसे कहें क्योंकि स्वयं भारत सरकार के केंद्रीय रेल राज्यमंत्री मनोज सिन्हा ने यह सपना दिखाया है। उनका कहना है कि विशेषज्ञों की टीम देश में 12 रूटों की सर्वे रिपोर्ट भारत सरकार को सौपेंगी। इसमें नई दिल्ली-मुरादबाद-वाराणसी पर विशेष फोकस है। बुलेट ट्रेन का रूट, यात्रियों की संख्या, दो स्टेशनों के बीच की दूरी, क्षेत्र की आर्थिक स्थिति एवं जमीन की गुणवत्ता और उपलब्धता का आंकलन किया जा रहा है। ये ट्रेनें 320 किमी प्रति घंटा की गति से दौड़ेंगी।रेल मंत्रालय ने देश के उन 12 रूटों का चयन किया है, जो सबसे तेज एवं व्यस्त गलियारों में माने जाते हैं। इस कड़ी में जर्मनी की सर्वे टीम ने मैसूर-चेन्नई रेलखंड पर प्रथम चरण की रिपोर्ट बना ली है। नई दिल्ली-भोपाल, नई दिल्ली-मुंबई, पुणे-मुंबई, हैदराबाद-चेन्नई, प्रयागराज-पटना, बंगलुरु-चेन्नई-तिवेंद्रम सहित कई ट्रैकों पर फिजिबिलटी रिपोर्ट बनाई जा रही है।
दरअसल, रेल राज्य मंत्री का यह भी दावा है कि नई दिल्ली-कानपुर-प्रयागराज रूट का कई बार सर्वे हो चुका है। नई दिल्ली-वाराणसी के बीच दोहरीकरण करने के साथ ही ट्रैक की क्षमता को बढ़ाया गया है। इस ट्रैक पर 180 से 200 किमी प्रति घंटा की रफ्तार वाली सेमी बुलेट ट्रेन आजमाई जा चुकी है। तो बुलेट के लिए नया कॉरीडोर भी बनाया जा सकता है। ये ट्रेनें 300 किमी प्रति घंटा से ज्यादा रफ्तार से दौड़ती हैं। ट्रेन का इंजन पूरी तरह एरोडायनमिक होता है। यह अत्यंत सुरक्षित माना गया है। जापान में सबसे पहले 1964 में बुलेट ट्रेन चली थी। आज तक किसी यात्री की मौत नहीं हुई। अब चीन, फ्रांस, दक्षिण कोरिया में बुलेट ट्रेन यात्रा का बेहद अहम जरिया है। भारत में इसका किराया फर्स्ट एसी के किराए से डेढ़ गुना होगा। अचानक इस बात को उछाले जाने के मकसद को आगामी चुनाव से जोड़कर लॉलीपॉप के रूप में देखा जा रहा है।
पूरा विवरण एक सरस कथा को पढऩे का आनन्द देता है और पढऩे वाला, अगर भारतीय है तो सपने देखने लगता है। क्योंकि वह परोसे जाने वाले सपनों में जीने का आदी हो चुका है और अगर पढऩे वाला कोई विदेशी है तो वह पेट पकड़-पकड़ हँसेगा। क्योंकि वह हकीकत जानता है और हकीकत यह है कि देश में पिछले पाँच वर्षों से मुम्बई-अहमदाबाद रूट पर बुलेट ट्रेन का शोर सरकार मचा रही है और अब तक शोर ही शोर हो रहा है। सारे शोर के बीच हकीकत यह सामने आती है कि इसी रेल को लेकर अभी तक महज बतकहाव हो रहा है। और इस ट्रेन का सपना अभी कागजों में ही है और योजना का प्रस्ताव ही आलोचनाओं की बौछार झेल रहा है। जाहिर है कि अभी पहली ही बुलेट टे्रन का ठिकाना किसी को दिख नहीं रहा है और मोदी सरकार के रेल मंत्री 12 बुलेट ट्रेनों का जुमला उछालने लगे हैं। जनाब याद रखिये…. ऐसे जुमले लोग कैच कर लेते हैं और जब ये पूरे नहीं होते तो उलटकर उछालने वाले पर ही पत्थर जैसे वापस बरसाते हैं।

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