(लेखक- डॉ. अरविन्द जैन )
अभी आम का मौसम आने वाला हैं। आम स्वयं पकते हैं और पकाये जाते हैं। जो स्वयं पकते हैं वे डाली से स्वयं टूट जाते हैं उनमे मिठास भी होती हैं और नैसर्गिक स्वाद भी होता हैं और दूसरे जल्दी जल्दी पकाये जाने के लिए उन्हें पाल में रखा जाता हैं और उन्हें बार बार देखते हैं। उनमे कोई अधिक मिठास नहीं होती हैं।

जो व्यक्ति एक सामान्य संघ के कार्यकर्त्ता होने के बाद लम्बे अर्से तक सबसे बड़े पद यानी पार्टी अध्यक्ष, उप प्रधान मंत्री तक बन गए और पूरा जीवन कार्य करते करते इतनी लम्बी पारी खेलते हुए यहाँ तक पहुंच कर अभी भी पद की अभिलाषा रखना स्वयं आत्मचिंतन का विषय हैं। जब माहोल विपरीत हो तो शुतुरमुर्ग जैसे शांत रहना चाहिए, यदि आप सरकारी सेवक होते तो ३० साल पहले सेवा निवृत्त कर दिए जाते।

कहावत भी हैं की गुरु गुड़ होता हैं और चेला शक्कर हो जाता हैं। राजनीती का नियम हैं जो जिस सीढ़ी से ऊपर जाता हैं उस सीढ़ी को तोड़ देता हैं,आपके बनाये चेलों ने जब आपकी उपयोगिता नहीं समझी, देखी तो आपको लूप लाइन में डाल दिया यह कोई नहीं बात हैं। समझदारी यह थी की देश, काल, समय, स्थिति को देखते स्वयं अपने आपको खींच लेते। पर पद लिप्सा के लिए आपने अध्यक्ष और प्रधानसेवक से हाथ जोड़े, वंदना की और उसके बाद आपको तिरस्कार मिला, यदि आप स्वयं पद की अभिलाषा न कर त्याग देते तो संभव था की आपको इज़्ज़त भी मिलती और टिकट भी पर आपने पद पाने के लिए अपनी गरिमा को तिलांजलि दी और आप हांसिये पर आ गए।

आप इस समय अपनी चिंता करे और पार्टी और राजनीती को त्यागे। छोड़ने और त्यागने में बहुत अंतर होता हैं छोड़ने में पाने की इच्छा होती हैं और त्यागने में फिर अभिलाषा समाप्त हो जाती हैं। वैसे भी आपको सम्मान सहित बिदाई होंगी और आपने त्याग कर दिया होता तो उन सबको सोचने को मजबूर होना पड़ता,

आप चिंतक हैं, ज्ञानवान हैं अपना शेष जीवन स्व कल्याण में बिताये और न रहे मार्गदर्शक में, कारण उस भीड़ में आप अकेले रहते हैं, क्योकि आपका गुट नहीं रहा, आपके समर्थक जो भी हैं उनको भी दरकिनार कर दिया जा रहा हैं, इससे सबसे अच्छी समझदारी शांत भाव से रहे, अपेक्षा दुःख का कारण हैं। किसकी अपेक्षा, क्यों करना। क्योकि इस समय पार्टी और सत्ता में एकाधिकारवाद चल रहा हैं, कारण अभी दोनों का पुण्य का उदय हैं तो सफलता मिल रही हैं और सत्ता और पार्टी में शक्ति होने से उनमे तानाशाह वृत्ति आ चुकी हैं, उन्हें अब आपकी योग्यता /अनुभव ज्ञान की आवश्यकता नहीं हैं, इसके लिए विगत पांच वर्ष पूर्व आप अलग होते तो संभव हैं आपकी आज पूंछ होती।

आप स्वयं चिंतन करे की विगत पांच वर्षों में कितनी राजनैतिक गिरावट आयी हैं इसे समझे और सिर्फ भाषणों में विकास हुआ। और एक बात और हाँ यदि आपको टिकिट दी जाती तो आपको हरवा देते और आपकी मट्टी पलीद हो जाती हैं, ये दोनों बहुत होशियार और धोकेबाज़ हैं, ये किसी की सगे नहीं हैं। जब समय विपरीत हो तो शांत रहना अच्छा कारण जहाँ बेदर्द हाकम हो वह फरियाद क्या करना।

राजनीती अब समझदार लोगों की नहीं रही, जो गुंडे लुच्चे लफंगे मावली अपराधी हैं उनके लिए हैं आप क्यों इस चक्कर में पड़े हो।

एक बात और कहनी हैं हमें कि
पदवाले ही पदोपलब्धि हेतु
पर को पद-दलित करते हैं,
पाप -पाखंड करते हैं !
प्रभु से प्रार्थना हैं कि
अपद ही बने रहे हम !
जितने भी पद हैं
वे विपदाओं के आस्पद हैं
पद-लिप्सा का विषधर वह
भविष्य में भी हमें न सूघें
वह यही भावना रहे विभो
इसलिए जो कुछ हुआ अच्छा हुआ और जो भी होता हैं वह अच्छे के लिए होता हैं और आगामी घटना भविष्य के गर्भ में छिपी हैं।

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