(लेखक- डॉ हिदायत अहमद खान)
यह तो तय हो चुका है कि वर्तमान राजनीतिक दौर समाजसेवा, जनकल्याण और राष्ट्रभक्ति के नारे लगाने वाला है, जहां हकीकत में कुर्सी प्राप्त करना अधिकांश राजनीतिक पार्टियों और नेताओं का ध्येय बन चुका है। इसलिए जैसे ही चुनाव का समय करीब आता है अधिकांश नेता एक-दूसरे पर इस कदर कीचढ़ उछालने लग जाते हैं कि एहसास होने लगता है कि साफ-सुथरी छवि वाले नेताओं का देश में टोटा आन पड़ा है।

नेता खुद एक-दूसरे को अपराधी घोषित करते, सजाएं सुनाते प्रतीत होते हैं, जिससे आमजन को सोचना पड़ जाता है कि क्या यही लोग अब देश में बचे हैं जिनके हाथों में राष्ट्र की कमान सौंपी जानी है। आखिर ये वही लोग तो हैं जो सत्ता में रहते हुए अपने प्रतिद्वंदी को जेल भेजने की बात करते हैं और विपक्ष में आने के बाद खुद को कानून के शिकंजे से बचाने की जुगत भिढ़ाते भी दिखाई दे जाते हैं। विचारणीय है कि इस तरह की मुहिम चलाने वाले कथित नेता आखिर देश में बदलाव का दौर कैसे ला सकते हैं, क्योंकि इनकी मानसिकता तो खुद चोर या महाचोर, डकैत या महाडकैत वाली जो हो चुकी होती है। इनसे जनकल्याण की बातें करना बेमानी लगता है, क्योंकि इन्हें अपने अलावा किसी और की परवाह होती ही नहीं है।

खुद का दामन साफ-पाक बताने वाले ये कथित नेता दूसरों पर इस कदर उंगली उठाते हैं कि जनता भी सोचने पर मजबूर हो जाती है कि दाल में कुछ तो काला है, वर्ना ये इस कदर क्योंकर शोर मचाते दिखाई देते। फिलहाल देश में लोकसभा चुनाव का बिगुल बजाया जा चुका है और ऐसे में सत्ताधारी भाजपा ने कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी पर आय से अधिक संपत्ति का गंभीर आरोप लगाते हुए अनेक सवाल दाग दिए हैं। बकायदा प्रेस कॉन्फ्रेंस कर बताया जा रहा है कि राहुल ने 2004 में अपना नामांकन दाखिल करते हुए 55 लाख की संपत्ति होना बताया था, फिर 2014 में उनकी संपत्ति बढ़कर 9 करोड़ की कैसे हो गई? इस संबंध में भाजपा प्रवक्ता संबित पात्रा फायर राउंड खेलने की भूमिका में आगे आते हैं और कहते हैं कि ‘आखिर संपत्ति में यह बड़ा इजाफा कैसे हो गया, जबकि उनकी कमाई का एकमात्र साधन सांसदी ही है और वह कोई डॉक्टर या वकील जैसे प्रोफेशन में भी नहीं हैं।’

इसके साथ ही उन्होंने जो बातें और तथ्य रखे उससे ऐसा प्रतीत हुआ मानों वो किसी बड़े राज से पर्दा उठाने जा रहे हैं। ऐसा करके वो गांधी परिवार को ही जेल भिजवाने वाले हैं, लेकिन सवाल यही है कि साल 2017 में जो आय से अधिक संपत्ति बनाने का मामला अदालत तक पहुंचा था, उसका क्या हुआ? यही नहीं नोटबंदी के बाद जो सत्ता पक्ष के नेताओं और कुछ सहयोगियों पर अकूत संपत्ति बनाने के आरोप लगे थे, उनका भी तो आज तक कुछ होता हुआ दिखाई नहीं दिया है। उसमें न जाने कितने नेताओं और मंत्रियों के नाम सामने आए थे, लेकिन सब कुछ चलता है वाली परिपाटी के तहत कहीं कुछ नहीं हुआ।

गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट ने देश के कुछ सांसदों और विधायकों की संपत्ति में पांच सौ फीसदी तक के इजाफे पर सवाल उठाए थे और संबंधितों से पूछा था कि वो यह बताएं कि उनकी आय में इतनी तेजी से बढ़ोत्तरी क्या बिजनेस से हुई है? इसके बाद भी कोर्ट ने फुलस्टाप नहीं लगाया था बल्कि उसने आगे कहा था कि यदि हॉं तो फिर सवाल उठता है कि सांसद या विधायक रहते हुए वे कोई बिजनेस कैसे कर सकते हैं? यह एक गंभीर प्रश्न है, जिस पर समय रहते जवाब आना चाहिए था, लेकिन चोर-चोर मौसेरे भाई वाली कहावत सदा से चरितार्थ होती आई है, इसलिए अदालतें गंभीरता दिखती रहीं और सियासी खेमा अपनी ही चाल में मस्त नजर आया। तब अदालत ने तो यहां तक कह दिया था कि अब वक्त आ गया है कि भ्रष्ट नेताओं के खिलाफ कैसे जांच हो और तेजी से फास्ट ट्रैक कोर्ट में सुनवाई हो।

मतलब साफ है कि अदालत भी इस मामले को गंभीरता से लेती और जल्द से जल्द कार्रवाई करने के मूड में है, लेकिन राजनीतिक इच्छाशक्ति कुछ खास होने नहीं देना चाहती है। इसलिए सुप्रीम कोर्ट ने सरकार से सालों पहले एनएन वोरा की रिपोर्ट पर क्या कुछ हुआ इसकी भी जानकारी मांगी थी, क्योंकि इतने सालों बाद भी तो समस्या ज्यों की त्यों नजर आती है। इसमें शक नहीं कि जनता को पता होना चाहिए कि नेताओं की आय क्या है और वह किसी तरह से छुपी नहीं होनी चाहिए। ऐसा होने के बाद संभवत: चुनाव में नेताओं की संपत्ति जैसे विवाद उछाले नहीं जा सकेंगे और कोई नेता छल-कपट के चलते किसी पर कीचढ़ उछालने वाली राजनीति भी नहीं कर पाएगा।

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